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भारतीय बच्चों में बढ़ रहा अस्थमा का खतरा, पेरेंट्स को सावधानी बरतने की जरूरत।

भारतीय बच्चों में बढ़ रहा अस्थमा का खतरा, पेरेंट्स को सावधानी बरतने की जरूरत।

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The risk of asthma is increasing in Indian children, parents need to be careful.

अस्थमा रेस्पिरेटरी सिस्टम यानी सांस से जुड़ी एक समस्या है जिसमें वायु मार्ग के रास्ता बाधित हो जाता है जिसके चलते घरघराहट, खांसी और सांस उखड़ने लगता है. पिछले कुछ वर्षों में भारत में बच्चों के अंदर अस्थमा की परेशानी चिंताजनक रूप से बढ़ी है. यथार्थ हॉस्पिटल ग्रेटर नोएडा में पल्मोनोलॉजिस्ट डॉक्टर हरीश वर्मा ने इस लेख के जरिए अस्थमा के बढ़ते मामलों पर प्रकाश डाला है और इलाज के लिए उपलब्ध एडवांस चीजों के बारे में जानकारी दी है।

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भारत में बच्चों में अस्थमा के मामलों में काफी वृद्धि देखी गई है. कुछ शहरी क्षेत्रों में इसकी प्रसार दर 10-15% तक होने का अनुमान है. अस्थमा को बढ़ाने में कई कारक जिम्मेदार होते हैं, जिसमें पर्यावरण प्रदूषण, जेनेटिक प्रवृत्ति, एलर्जी और लाइफस्टाइल में बदलाव शामिल है. शहरीकरण, औद्योगीकरण में वृद्धि, और खराब आदतों को अपनाने ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है।

अस्थमा का इलाज न होने पर इसके परिणाम: अगर अस्थमा का इलाज न कराया जाए या इसे खराब तरीके से मैनेज किया जाए तो बच्चे की हेल्थ और क्वालिटी ऑफ लाइफ पर गंभीर असर हो सकता है.
-फेफड़ों का सही से काम न करना: वायुमार्ग में लगातार सूजन समय के साथ फेफड़ों के फंक्शन को प्रभावित कर सकती है. इसका असर ये होता है कि एक्सरसाइज ज्यादा वक्त नहीं हो पाती, या फिर सांस से जुड़े तमाम समस्याएं होने लग जाती हैं।

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बार-बार एक्ससेर्बेशन: अगर अस्थमा का इलाज न कराया जाए तो इससे बार-बार अस्थमा अटैक पड़ने का खतरा रहता है. इसमें सांस लेने में काफी ज्यादा तकलीफ रहती है और इमरजेंसी सेवाओं पर निर्भरता बढ़ जाती है.

नींद में परेशानी: जिन बच्चों का अस्थमा कंट्रोल नहीं हो पाता उन्हें रात में अक्सर खांसी और घरघराहट जैसी समस्याएं होती हैं जिससे उनकी नींद प्रभावित होती है. इससे थकान, एकाग्रता में कमी और उनकी पढ़ाई पर असर पड़ सकता है.

फिजिकल और इमोशनल असर: अस्थमा के चलते बच्चे फिजिकल एक्टिविटी में ज्यादा हिस्सा नहीं ले पाते जिससे उनपर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. वो अलग-थलग पड़ जाते हैं और उनकी साइकोलॉजिकल हेल्थ पर भी असर पड़ता है. वो भावनात्मक तौर पर बिखर जाते हैं.

बचाव के तरीके
अस्थमा से बच्चों को बचाने के लिए सावधानियां बरतना बहुत जरूरी है. नीचे कुछ टिप्स दिए गए हैं जिन्हे फॉलो कर अस्थमा से बच्चों को बचाया जा सकता है.

1- अस्थमा को ट्रिगर करने वाले लक्षणों को पहचाने और बचें: धूल-मिट्टी, ज्यादा सुगंध, तंबाकू का धुंआ, पालतू जानवरों की डैंड्रफ जैसी चीजों से बचें. अपने आसपास के वातावरण को क्लीन रखें, एलर्जी प्रूफ बिस्तर का इस्तेमाल करें और घर के अंदर एयर क्वालिटी को मेंटेन रखें.
2- टीकाकरण: अपने बच्चों को सभी तरह के आवश्यक टीके लगवाएं जिसमें इन्फ्लूएंजा वैक्सीन भी शामिल है. इससे बच्चे सांस से जुड़े इंफेक्शन से बचेंगे और अस्थमा के लक्षणों में कमी आएगी.
3- साफ-सफाई का ध्यान रखें: बच्चों को लगातार हाथ धुलने और रेस्पिरेटरी सिस्टम से जुड़े अन्य हाइजीन मेंटेन कराएं. जैसे छींकते या खांसते समय मुंह और नाक को कवर करें.
4- हेल्दी लाइफस्टाइल: बच्चों को फिजिकल एक्टिविटी में इंगेज करें ताकि उनकी लाइफस्टाइल बेहतर हो सके. बैलेंस डाइट दें, और आसपास स्मोक-फ्री वातावरण दें.

अस्थमा के इलाज में हुई तरक्की
अस्थमा के लिए इलाज के तौर-तरीकों में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, जिससे स्थिति के मैनेजमेंट और कंट्रोल में सुधार हुआ है.
1- इनहेलर डिवाइस: मॉडर्न इनहेलर डिवाइस से सीधे वायुमार्ग को राहत मिलती है, इससे एकदम टारगेट पर जाकर दवाई लगती है और अच्छा असर होता है. आजकल कई तरह के इनहेलर उपलब्ध हैं जिनमें मीटर्ड-डोज इनहेलर (MDIs), ड्राई पाउडर इनहेलर (DPIs) और सॉफ्ट मिस्ट इनहेलर (SMIs) शामिल हैं. ये इनहेलर अस्थमा से पीड़ित बच्चों के लिए काफी असरदार रहते हैं.
2- पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट: आजकल डॉक्टर हर बच्चे के हिसाब से उसका इलाज प्लान करते हैं. बच्चे को अस्थमा कितना गंभीर है, क्या लक्षण हैं और ट्रिगर किस चीज से हो रहा है, इस सबका ध्यान रखते हुए ट्रीटमेंट प्लान किया जाता है. इससे बच्चों को काफी फायदा मिलता है और गलत रिजल्ट आने के रिस्क कम हो जाते हैं.
3- बायोलॉजिकल थेरेपी: मोनोक्लोनल एंटीबॉडी सहित बायोलॉजिकल दवाएं, उसी जगह टारगेट करती हैं जहां अस्थमा की सूजन होती है. इससे गंभीर अस्थमा के मामलों में भी खुशी देने वाली रिजल्ट आए हैं, एक्ससेर्बेशन की आवृत्ति को इसने कम किया है और फेफड़ों के फंक्शन में सुधार किया है.
4- डिजिटल हेल्थ सॉल्यूशन: टेक्नोलॉजी के एकीकरण ने अस्थमा मैनेजमेंट में क्रांति ला दी है. मोबाइल एप्लिकेशन और पहनने योग्य डिवाइस लक्षणों को ट्रैक करने, फेफड़ों के कार्य की निगरानी करने और बेहतर सेल्फ मैनेजमेंट के लिए रियल टाइट गाइडेंस में मदद करती हैं.

भारतीय बच्चों में बढ़ रही अस्थमा की समस्या के प्रति डॉक्टरों से लेकर पॉलिसी मेकर्स और पैरेंट्स सभी को ध्यान देना होगा. अस्थमा के इलाज न होने पर इससे होने वाले नुकसान को समझना होगा और बचाव के तरीके अपनाने होंगे. इलाज के नए मॉड्यूल यूज करने होंगे. इस तरह एक समग्र सोच के साथ बचाव की रणनीति बनानी होगी, ट्रीटमेंट प्लान करना होगा, इनोवेटिव थेरेपी का इस्तेमाल करना होगा ताकि अस्थमा को मैनेज किया जा सके और अपने बच्चों को बेहतर भविष्य दिया जा सके.

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Vijay Bharat

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